Tuesday, 3 May 2016

भुगतान

भुगतान
छोटे से वेतन में वो परिवार भी पाल रहा था और पत्रिका का संपादन भी कर रहा था. परिवार वालों को यह काम फूटी आंखों नही सोहाता था.. उसकी जिद हमेशा ही जीतती आई थी.. इस बार का अंक तैयार था प्रेस के लिये.वेतन का अधिकांश भाग पत्नी की बीमारी में खर्च हो चुका था.. जेब खाली होने को थी . प्रेस से बात करके छपाई का काम खत्म हुआ.. बारी भुगतान करने की थी.. वो जैसे ही उतरे हुये मुंह के साथ प्रेस पहुंचा.. तो प्रेस वाले ने पेड़ बिल थमाते हुये पत्रिका का बंडल उसे सौंप दिया..बिल के पीछे लिखा था.. तूने मेरी तुकबंदी कवितायें शुरूआती दौर मे प्रकाशित करके मुझे कवि बनाया... आज यह छोटा सा सहयोग तेरे बहुत अच्छे दोस्त की तरफ से- आलोक....आईपीएस आफीसर......

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