लघुकथा - न्यूनतम-समर्थन-मूल्य
कलुआ धान की फसल बेंचकर घर लौटा तो उसकी मेहरारू ने लोटा भर पानी देते हुए पूंछ बैठी
"का रमुआ के बापू बिक गयी फसल? कितना मिला मंड़ी से"
"अब तुम्हे का बताएं चार दिन बिताय के तौल मिली। ससुरा कौनो सुनतै नहीं रहा। तीन दिन हांँथ पैड़ जोडे हम। " कलुआ ने पानी गटकते हुए कहा।
"तब तौ जो रूपिया कौडी तुम लिए रहे वहौ खरच दिये हुइहौ।" मेहरारू ने कहा
"कुछू फायदा न भया तो एक पल्लेदार का 100 रूपैया देन पड़ा। तब जाकर तौली गयी धान! ५० रूपिया के हिसाब से बिकी है थस क्विंटल।" कलुआ ने कहा
"तुम तौ कहत रहो कि 175 के हिसाब से बिकी। न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार लागू करिस ही। या कैसन हिसाब आय।" मेहरारू निराश हुई गयी।
"अब का बताई इ फसल मा इतना खर्चा है कि या तो चुकावैं मा लग जई। बनिया के यहां तो कुछ ज्यादै मिल जात।" कलुआ को रूलाई छूट गई।
"अब ता चना बोवा तुम और बनिया का बेंचा। मंड़ी ता ससुरी लूट लिहिस हमका। या मंडी नासकाटी पढ़े लिखें वाले के खातिर आय। हमरे खातिर नहीं।" मेहरारू ने समझाया।
" अब हमै समझ आय गा बनिया तो हम पंचन का समझत है और तुरंत फसलौ लेत है। मंडी मा मूल्य तो कछु नहीं। समर्थन भी नहीं मिलत आय। काहे का न्यूनतस समर्थन मूल्य।" कलुआ ने मेहरारू को ढाँढ़स बंँधाया।
अनिल अयान।।।
No comments:
Post a Comment